ये वक़्त जो इन्सान पर मेहरबान हो जाये तब तो दुनिया हसीं हो जाये
जुर्म की उम्र बहुत कम होने लगे
जख्म का दर्द भी माकूल हो जाये
न रह सके बंदिशे ज़माने की
जमाना खुद शरीफ हो जाये
यूँ तो हर वक़्त शै की गुलाम होती है
जिंदगी देख बड़ी मेहरबान होती है
दूर तक देख जरा निगाहों से
आसमान जमी की जान होती है
पास से देख जरा आशियाने से
नजर भी किसी-किसी पर मेहरबान होती है.....
जख्म का दर्द भी माकूल हो जाये
न रह सके बंदिशे ज़माने की
जमाना खुद शरीफ हो जाये
यूँ तो हर वक़्त शै की गुलाम होती है
जिंदगी देख बड़ी मेहरबान होती है
दूर तक देख जरा निगाहों से
आसमान जमी की जान होती है
पास से देख जरा आशियाने से
नजर भी किसी-किसी पर मेहरबान होती है.....
5 comments:
बहुत खूब कहा है आपने , बधाई । आभार खबरों की दुनियाँ में आपके आगमन - मित्रता करने का ।
काश जुर्म की उम्र कम हो जाती और
जख्म का दर्द भी माकूल हो जाता....
जिंदगी कितनी हसीं हो जाती
Best wishes,
irfan
bahut badhiyan
ये वक़्त जो इन्सान पर मेहरबान हो जाये तब तो दुनिया हसीं हो जाये ---- theek kha aapne.
बहुत भावपूर्ण प्रस्तुति..बहुत सुन्दर..
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