ये वक़्त जो इन्सान पर मेहरबान हो जाये तब तो दुनिया हसीं हो जाये
जुर्म की उम्र बहुत कम होने लगे
जख्म का दर्द भी माकूल हो जाये
न रह सके बंदिशे ज़माने की
जमाना खुद शरीफ हो जाये
यूँ तो हर वक़्त शै की गुलाम होती है
जिंदगी देख बड़ी मेहरबान होती है
दूर तक देख जरा निगाहों से
आसमान जमी की जान होती है
पास से देख जरा आशियाने से
नजर भी किसी-किसी पर मेहरबान होती है.....
जख्म का दर्द भी माकूल हो जाये
न रह सके बंदिशे ज़माने की
जमाना खुद शरीफ हो जाये
यूँ तो हर वक़्त शै की गुलाम होती है
जिंदगी देख बड़ी मेहरबान होती है
दूर तक देख जरा निगाहों से
आसमान जमी की जान होती है
पास से देख जरा आशियाने से
नजर भी किसी-किसी पर मेहरबान होती है.....