
वक़्त अगर आदमी पर मेहरबान होने लगे
आदमी खुली आँखों से भी सोने लगे
कभी जगना चाहे न बह स्वप्न से
हर वक़्त बह सिर्फ स्वप्न में रहने लगे
जगना चाहे तब भी ना खुलेंगी आंखे
स्वप्न रंगीन निगाहें जो पिरोने लगे
तभी तो वक़्त दिखलाता रहा है खेल कई
कल था आज है शायद अभी न रहे
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